
भैरवी माता
भैरवी माता, विशेष रूप से त्रिपुर भैरवी के रूप में पूजित, देवी का शक्तिशाली स्वरूप हैं जो तपस्या, अनुशासन, साहस और आन्तरिक परिवर्तन से जुड़ा है।
सरल मन्त्र
ॐ भैरव्यै नमः
दिन
मंगलवार
रंग
लाल
भोग
हलवा
पर्व
नवरात्रि
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
तपस्या, अनुशासन, साहस, वाणी की शुद्धि और भय को शक्ति में बदलना
आवश्यक मर्यादा
महाविद्या और तांत्रिक साधनाएँ योग्य गुरु से ही सीखनी चाहिए
भैरवी माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
भैरवी माता, विशेष रूप से त्रिपुर भैरवी के रूप में पूजित, देवी का शक्तिशाली स्वरूप हैं जो तपस्या, अनुशासन, साहस और आन्तरिक परिवर्तन से जुड़ा है।
माँ भैरवी जी की कथा
माँ भैरवी जिन्हें त्रिपुर भैरवी, महाभैरवी, कालरात्रि स्वरूपा और दशमहाविद्याओं में पाँचवीं महाविद्या के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में तप, शक्ति, साहस, आत्मपरिवर्तन और आध्यात्मिक जागरण की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनका स्वरूप तेजस्वी, उग्र और दिव्य है, किंतु वे अपने भक्तों के प्रति अत्यंत करुणामयी और कल्याणकारी हैं। वे अज्ञान, भय, आलस्य और अधर्म का नाश करके साधक को आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करती हैं।
तांत्रिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार जब सृष्टि में अधर्म, अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा, तब आदिशक्ति ने अनेक रूप धारण करके धर्म की रक्षा की। उन्हीं दिव्य रूपों में से एक माँ भैरवी का स्वरूप है, जो तपस्या, अनुशासन और आत्मशक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
एक प्राचीन कथा के अनुसार देवताओं और ऋषियों ने आदिशक्ति से प्रार्थना की कि वे ऐसी शक्ति प्रकट करें जो साधकों के भीतर छिपे भय, मोह और अज्ञान को नष्ट कर सके। उनकी प्रार्थना से एक दिव्य लाल आभा प्रकट हुई। उस तेज से माँ भैरवी अवतरित हुईं। उनका स्वरूप उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी था और उनकी आँखों में दिव्य ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित थी।
माँ भैरवी के प्रकट होते ही समस्त दिशाएँ उनके तेज से आलोकित हो उठीं। देवताओं ने अनुभव किया कि यह शक्ति केवल बाहरी शत्रुओं का विनाश करने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के अज्ञान और दुर्बलताओं को दूर करने के लिए भी अवतरित हुई है।
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