शिव जी

शिव जी

शिव जी उपासना आंतरिक शांति, रूपांतरण और समर्पण के लिए की जाती है।

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

दिन

सोमवार

रंग

श्वेत

भोग

भांग और धतूरा

पर्व

महाशिवरात्रि

सावन सोमवार

संक्षिप्त तथ्य

पाठ शैली

एक समय में एक पाठ

मुख्य भाव

आंतरिक शांति, रूपांतरण और समर्पण

शिव जी की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

शिव जी उपासना आंतरिक शांति, रूपांतरण और समर्पण के लिए की जाती है।

शिव जी की कथा

भगवान शिव जी सनातन धर्म के सबसे शक्तिशाली और पूजनीय देवताओं में से एक है। वे हिंदू धर्म के त्रिदेवों में से एक है। जहाँ ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता है, विष्णु जी पालनकर्ता है, और महादेव शिव जी संहारकर्ता है। उन्हें महाकाल, नीलकंठ, भोलेनाथ, महादेव, पशुपतिनाथ और आदिदेव जैसे अनेक पवित्र नामों से जाना जाता है। वे बुराई के संहारक, सर्वोच्च योगी और परिवर्तन के शाश्वत प्रतीक है। उनका कार्य केवल विनाश तक सीमित नहीं है — बल्कि वे नकारात्मकता को समूल नष्ट कर इस ब्रह्मांड में संतुलन, शांति और नवआरंभ की स्थापना करते है।
शिव जी की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक समुद्र मंथन की है। एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। इस मंथन में अनेक दिव्य वस्तुएँ निकलीं — कामधेनु गाय, लक्ष्मी जी, अमृत और साथ ही भयंकर हलाहल विष भी निकला। यह विष इतना भयानक था कि उसकी गर्मी से सारी सृष्टि जलने लगी। देवता और असुर सभी भयभीत हो गए। तब सब भगवान विष्णु के पास गए, विष्णु जी ने कहा — 'इस विष को केवल महादेव शिव ही धारण कर सकते है।'
सभी देवता कैलाश पर्वत पर शिव जी के पास पहुँचे और प्रार्थना की। भोलेनाथ ने बिना एक क्षण सोचे वह भयानक हलाहल विष अपनी हथेली में उठाया और पी गए। माता पार्वती जी ने तुरंत शिव जी का गला अपने हाथों से दबा दिया ताकि विष नीचे न उतरे। वह विष शिव जी के कंठ में ही रुक गया और उनका गला नीला पड़ गया। तभी से भगवान शिव 'नीलकंठ' कहलाए। उन्होंने सारी सृष्टि को बचाने के लिए स्वयं कष्ट उठाया।
यह कथा शिव जी के त्याग, निस्वार्थ भाव और समस्त सृष्टि के रक्षक स्वरूप को दर्शाती है। वे कैलाश पर्वत पर गहन ध्यान में लीन रहते है, जहाँ वे योगी रूप में संसारिक इच्छाओं से दूर रहकर आत्मशांति में स्थित रहते है।

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