
दुर्गा माता
दुर्गा माता उपासना रक्षा, साहस और नकारात्मकता पर विजय के लिए की जाती है।
बीज मंत्र (कृपा प्राप्ति)
ॐ दुं दुर्गायै नमः
दिन
शुक्रवार
रंग
लाल
भोग
हलवा
पर्व
नवरात्रि
दुर्गा पूजा
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संक्षिप्त तथ्य
पाठ शैली
एक समय में एक पाठ
मुख्य भाव
रक्षा, साहस और नकारात्मकता पर विजय
दुर्गा माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
दुर्गा माता उपासना रक्षा, साहस और नकारात्मकता पर विजय के लिए की जाती है।
दुर्गा माता की प्रसिद्ध कथा
देवी दुर्गा माता सनातन धर्म की अत्यंत पूजनीय और शक्तिशाली देवी हैं। उन्हें शक्ति, साहस, रक्षा, धर्म की स्थापना और दुष्टों के विनाश की देवी माना जाता है। भक्त उन्हें जगजननी, आदिशक्ति और संकट हरने वाली माता के रूप में पूजते हैं।
प्राचीन समय में महिषासुर नाम का एक अत्याचारी असुर था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि कोई देवता या असुर उसका वध नहीं कर सकेगा। वरदान पाकर वह अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित कर इंद्रासन पर अधिकार कर लिया।
महिषासुर के अत्याचारों से देवता अत्यंत दुखी हुए। सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के पास पहुँचे। तब तीनों देवों के तेज से एक दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ। उसी प्रकाश से एक अद्भुत तेजस्विनी देवी प्रकट हुईं। वही माता दुर्गा थीं। सभी देवताओं ने माता दुर्गा को अपने-अपने दिव्य अस्त्र और शक्तियाँ प्रदान कीं। भगवान शिव ने त्रिशूल दिया, भगवान विष्णु ने चक्र दिया, इंद्रदेव ने वज्र दिया, वरुणदेव ने शंख दिया, अग्निदेव ने शक्ति दी और हिमालय ने सिंह वाहन प्रदान किया।
माता दुर्गा सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में पहुँचीं। उनका तेज देखकर महिषासुर की सेना भयभीत हो गई। महिषासुर ने अनेक रूप धारण कर माता से युद्ध किया। कभी वह भैंसे का रूप लेता, कभी सिंह, कभी हाथी और कभी मानव रूप धारण करता। युद्ध नौ दिनों तक चला। माता दुर्गा ने अपने अद्भुत पराक्रम से असुरों की विशाल सेना का संहार किया। अंत में दसवें दिन माता ने त्रिशूल और चक्र से महिषासुर का वध कर दिया। देवताओं ने प्रसन्न होकर माता की स्तुति की और स्वर्ग में पुनः शांति स्थापित हुई।
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