
गंगा माता
गंगा माता को ऐसी पवित्र नदी-देवी के रूप में पूजा जाता है जिनका स्मरण शुद्धि, कृपा और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।
मूल मंत्र
ॐ ह्रीं गंगायै विश्वरूपिणी नारायण्यै नमो नमः।
दिन
सोमवार
रंग
श्वेत
भोग
फल
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
पवित्रता, कृपा और मोक्ष की कामना
प्रमुख कथा
भगीरथ की तपस्या और शिव जटा से अवतरण
गंगा माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
गंगा माता को ऐसी पवित्र नदी-देवी के रूप में पूजा जाता है जिनका स्मरण शुद्धि, कृपा और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।
माँ गंगा जी की कथा
माँ गंगा जिन्हें गंगा मैया, भागीरथी, जाह्नवी, त्रिपथगा और देवनदी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में पवित्रता, मोक्ष, करुणा और दिव्य कृपा की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई हैं और भगवान शिव की जटाओं में विराजमान हैं। माँ गंगा को पापनाशिनी, मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी कहा जाता है — उनका जल केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र करता है। भक्त उन्हें संसार की सबसे पवित्र नदी, दिव्य माँ और मोक्ष का सीधा मार्ग मानकर पूजते हैं।
माँ गंगा के अवतरण की कथा राजा सगर और उनके साठ हजार पुत्रों से आरंभ होती है। सतयुग में अयोध्या के महाप्रतापी राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ का घोड़ा जब भ्रमण करते-करते पाताल लोक में पहुँचा, तो इंद्र ने छल से उसे महर्षि कपिल के आश्रम में बाँध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज में पाताल पहुँचे और उन्होंने महर्षि कपिल को चोर समझकर उनका अपमान कर दिया। क्रोधित महर्षि ने अपनी दृष्टि मात्र से उन सभी साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया। वे बिना मोक्ष के पाताल में ही भटकते रहे।
राजा सगर के पौत्र अंशुमान और फिर उनके पुत्र दिलीप ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए घोर तपस्या की, परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। अंततः दिलीप के पुत्र भागीरथ ने प्रण किया कि वे गंगा को पृथ्वी पर लाकर ही अपने पूर्वजों का उद्धार करेंगे। भागीरथ ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। परंतु समस्या यह थी कि गंगा का वेग इतना प्रबल था कि उसे सीधे पृथ्वी पर उतारने पर पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी।
भागीरथ ने फिर भगवान शिव की तपस्या की और प्रार्थना की कि वे गंगा को अपनी जटाओं में धारण करें। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। जब माँ गंगा स्वर्ग से उतरीं, तो उनका अहंकार था कि वे अपने वेग से शिव को बहा ले जाएँगी। परंतु भगवान शिव ने उन्हें अपनी घनी जटाओं में समेट लिया। माँ गंगा शिव की जटाओं में भटकती रहीं। तब भागीरथ ने पुनः शिव जी की स्तुति की। शिव जी ने प्रसन्न होकर अपनी जटाओं से गंगा की एक धारा छोड़ी जो हिमालय से होती हुई पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। इसीलिए भगवान शिव को गंगाधर कहा जाता है।
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