
गरुड़ देव
गरुड़ देव की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
गरुड़ देव मूल मंत्र
ॐ गरुड़ देवाय नमः
दिन
गुरुवार
रंग
केसरिया
भोग
फल
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संक्षिप्त तथ्य
पाठ शैली
एक समय में एक अनुभाग
मुख्य भाव
भक्ति, स्पष्टता और आध्यात्मिक अनुशासन
गरुड़ देव की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
गरुड़ देव की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
भगवान गरुड़ देव की कथा
भगवान गरुड़ देव हिंदू धर्म में पक्षीराज, भगवान विष्णु के परम वाहन, सर्पों के शत्रु और वीरता, गति, भक्ति एवं स्वतंत्रता के अधिष्ठाता देवता माने जाते हैं। वे पक्षियों के राजा हैं और उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी एवं विशाल है। भक्त उन्हें भगवान विष्णु के अनन्य सेवक, अमृत के रक्षक तथा संपूर्ण सृष्टि में धर्म और साहस का प्रतीक मानते हैं। उनके दर्शन मात्र से सर्पभय दूर होता है और जीवन में शक्ति एवं उत्साह का संचार होता है।
वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ देव का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ऋग्वेद में उनका उल्लेख श्येन पक्षी के रूप में मिलता है जो स्वर्ग से अमृत और सोम लाते हैं। महाभारत और विष्णु पुराण में उनकी विस्तृत कथाएँ वर्णित हैं। वे देवताओं और मनुष्यों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहे हैं।
गरुड़ देव की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणाप्रद है। महर्षि कश्यप की दो पत्नियाँ थीं — विनता और कद्रू। कद्रू सर्पों की माता बनीं और विनता गरुड़ की। एक बार दोनों के बीच उच्चैःश्रवा घोड़े के रंग को लेकर विवाद हुआ। कद्रू ने छल से यह दांव जीत लिया और विनता को दासी बना दिया।
माता विनता की दासता से मुक्ति के लिए गरुड़ देव ने नागों से अमृत लाने का वचन दिया। यह कार्य अत्यंत दुष्कर था क्योंकि अमृत इन्द्रलोक में कड़े पहरे में रखा था। किंतु गरुड़ देव ने अपने अद्भुत बल और पराक्रम से देवताओं को पराजित किया और अमृत प्राप्त करने में सफल हुए।
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