
गायत्री माता
गायत्री माता को वेदमाता, गायत्री मंत्र की मूर्त चेतना और बुद्धि को प्रकाशित करने वाली दिव्य जननी के रूप में पूजा जाता है।
सरल गायत्री मंत्र
ॐ श्री गायत्र्यै नमः
दिन
गुरुवार
रंग
श्वेत
भोग
पंचामृत
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संक्षिप्त तथ्य
दिव्य पहचान
वेदमाता, सावित्री, मंत्रशक्ति, ज्ञानमयी जननी
मुख्य साधना
संध्या-उपासना, मंत्रजप, शुद्धता, अध्ययन, अंतःप्रकाश
भक्ति का केंद्र
बुद्धि, पवित्रता, आध्यात्मिक विकास, विवेक
गायत्री माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
गायत्री माता को वेदमाता, गायत्री मंत्र की मूर्त चेतना और बुद्धि को प्रकाशित करने वाली दिव्य जननी के रूप में पूजा जाता है।
देवी गायत्री जी की कथा
देवी गायत्री जिन्हें वेदमाता, देवमाता और विश्वमाता के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में ज्ञान, प्रकाश, पवित्रता और दिव्य चेतना की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे पंचमुखी हैं और उनके पाँच मुख पाँच प्राणों, पाँच तत्वों और पाँच वेदों के प्रतीक हैं। देवी गायत्री को समस्त वेदों की जननी कहा जाता है — उनका गायत्री मंत्र संसार का सबसे प्राचीन, सबसे पवित्र और सबसे शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। भक्त उन्हें बुद्धि की देवी, अंधकार को मिटाने वाली दिव्य ज्योति और समस्त पापों का नाश करने वाली परम माता के रूप में पूजते हैं।
सतयुग की बात है। एक बार ब्रह्मा जी ने पुष्कर तीर्थ में एक महान यज्ञ का आयोजन किया। शास्त्रों के अनुसार इस यज्ञ को उचित समय पर संपन्न करना अत्यावश्यक था और यज्ञ में पत्नी का साथ होना अनिवार्य था। परंतु उस समय ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री देवी विलंब से आ रही थीं। देवताओं की प्रेरणा से ब्रह्मा जी ने एक गुज्जर कन्या से विवाह किया, जिन्हें इंद्र ने पवित्र कर दिया। वही दिव्य कन्या गायत्री के नाम से जानी गईं और उन्होंने ब्रह्मा जी के साथ उस महायज्ञ को पूर्ण किया। देवी गायत्री इस प्रकार ब्रह्मा जी की शक्ति और वेदों की माता के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
देवी गायत्री के प्रकट होने की एक और दिव्य कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि सृष्टि के आरंभ में जब चारों ओर अज्ञान और अंधकार था, तब भगवान ब्रह्मा ने तपस्या की। उनकी गहन साधना से प्रसन्न होकर परब्रह्म की शक्ति ने एक दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट होकर उन्हें गायत्री मंत्र का ज्ञान दिया। यही दिव्य शक्ति देवी गायत्री हैं। इसीलिए गायत्री मंत्र को समस्त मंत्रों का मूल और वेदों का सार माना जाता है। देवी गायत्री ने ब्रह्मा जी को वह दिव्य ज्ञान दिया जिससे उन्होंने इस सृष्टि की रचना की।
देवी गायत्री पंचमुखी हैं — उनके पाँच मुख क्रमशः श्वेत, नीले, पीले, लाल और हरे रंग के हैं, जो पाँच तत्वों — आकाश, जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु — के प्रतीक हैं। उनके दस हाथों में कमल, माला, कमण्डल, पुस्तक, त्रिशूल और अभय मुद्रा सुशोभित हैं। वे श्वेत हंस पर विराजमान रहती हैं जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। उनका रूप दिव्य, तेजोमय और मनोहारी है। उनके दर्शन मात्र से भक्त के मन का अज्ञान दूर हो जाता है और हृदय में दिव्य प्रकाश का उदय होता है।
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