काली माता

काली माता

काली माता उपासना भय का नाश और उग्र करुणा का जागरण के लिए की जाती है।

मूल मंत्र (बीज मंत्र)

ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥

दिन

शुक्रवार

रंग

काला

भोग

नारियल

पर्व

काली पूजा

नवरात्रि

संक्षिप्त तथ्य

पाठ शैली

एक समय में एक पाठ

मुख्य भाव

भय का नाश और उग्र करुणा का जागरण

काली माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

काली माता उपासना भय का नाश और उग्र करुणा का जागरण के लिए की जाती है।

काली माता की प्रसिद्ध कथा

काली माता की सबसे प्रसिद्ध कथा देवी दुर्गा और राक्षसों के युद्ध से जुड़ी है।
बहुत समय पहले शुंभ, निशुंभ, चंड और मुंड नामक अत्याचारी राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था। देवता उनसे हार गए और माँ दुर्गा की शरण में पहुँचे। तब माँ दुर्गा ने युद्ध के लिए अपना भयंकर रूप धारण किया। उनके क्रोध से उनके मस्तक से एक काली शक्ति प्रकट हुई, वही माँ काली थीं। माँ काली का रूप अत्यंत भयानक था—काला वर्ण, बिखरे बाल, गले में मुंडों की माला, हाथों में तलवार और त्रिशूल। उन्होंने युद्धभूमि में प्रवेश करते ही राक्षसों का संहार शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने चंड और मुंड नामक दैत्यों का वध किया। इस कारण माँ को "चामुंडा" भी कहा गया।
इसके बाद रक्तबीज नामक राक्षस आया। उसे वरदान था कि उसके रक्त की हर बूंद जमीन पर गिरते ही एक नया राक्षस पैदा हो जाता था। माँ काली ने अपनी विशाल जीभ फैलाकर उसका रक्त धरती पर गिरने से पहले ही पी लिया और उसका अंत कर दिया।
युद्ध के बाद माँ काली का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे तांडव करने लगीं, जिससे संसार संकट में पड़ गया। तब भगवान शिव उनके मार्ग में लेट गए। माँ काली का पैर जब शिवजी के सीने पर पड़ा, तब उन्हें होश आया और उनका क्रोध शांत हो गया। इसी कारण माँ काली की मूर्तियों में उन्हें शिवजी के ऊपर खड़े दिखाया जाता है।

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