कार्तिकेय जी

कार्तिकेय जी

कार्तिकेय जी उपासना वीरता, अनुशासन और दिव्य युवा ऊर्जा के लिए की जाती है।

मूल मंत्र

ॐ सरवनभवाय नमः

दिन

मंगलवार

रंग

लाल

भोग

पंचामृत

पर्व

स्कंद षष्ठी

नवरात्रि

संक्षिप्त तथ्य

पाठ शैली

एक समय में एक पाठ

मुख्य भाव

वीरता, अनुशासन और दिव्य युवा ऊर्जा

कार्तिकेय जी की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

कार्तिकेय जी उपासना वीरता, अनुशासन और दिव्य युवा ऊर्जा के लिए की जाती है।

कार्तिकेय जी की कथा

भगवान कार्तिकेय जी हिंदू धर्म के अत्यंत वीर, तेजस्वी और शक्तिशाली देवताओं में से एक माने जाते हैं। उन्हें युद्ध के देवता, देवसेना के सेनापति और भगवान शिव तथा माता पार्वती के पुत्र के रूप में पूजा जाता है। दक्षिण भारत में वे विशेष रूप से “मुरुगन”, “स्कंद”, “सुब्रह्मण्य” और “षण्मुख” नामों से प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन साहस, ज्ञान, अनुशासन और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
प्राचीन समय में तारकासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकता है। उस समय भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे और माता सती के वियोग के बाद संसार से विरक्त हो चुके थे। इसलिए तारकासुर को विश्वास था कि उसका अंत कभी नहीं होगा।
तारकासुर धीरे-धीरे अत्याचारी बन गया। उसने देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों को परेशान करना शुरू कर दिया। सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु और ब्रह्मा के पास गए। तब देवताओं को ज्ञात हुआ कि तारकासुर का अंत केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव है।
इसके बाद देवताओं ने माता पार्वती से प्रार्थना की। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। कुछ समय बाद भगवान शिव की दिव्य शक्ति से एक तेज उत्पन्न हुआ, जिसे अग्नि देव और फिर गंगा ने धारण किया। उसी दिव्य तेज से भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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