
खाटूश्याम जी
खाटूश्याम जी की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
खाटूश्याम जी मूल मंत्र
ॐ खाटू श्यामाय नमः
दिन
शुक्रवार
रंग
सिंदूरी
भोग
खीर
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संक्षिप्त तथ्य
पाठ शैली
एक समय में एक अनुभाग
मुख्य भाव
भक्ति, स्पष्टता और आध्यात्मिक अनुशासन
खाटूश्याम जी की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
खाटूश्याम जी की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
भगवान खाटू श्याम जी की कथा
भगवान खाटू श्याम जी हिंदू धर्म में अत्यंत चमत्कारी, करुणामय और भक्तवत्सल देवता के रूप में पूजित हैं। वे विशेष रूप से राजस्थान के सीकर जिले के खाटू नामक स्थान पर विराजमान हैं और लाखों भक्त प्रतिवर्ष उनके दर्शन के लिए आते हैं। भक्त उन्हें हारे का सहारा, बाबा श्याम, शीश के दानी और कलयुग के देवता के रूप में पूजते हैं। उनकी महिमा इतनी अपार है कि कहा जाता है जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, वे उसकी हर मनोकामना पूर्ण करते हैं।
खाटू श्याम जी की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। वे पांडु पुत्र भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे। बर्बरीक की माता का नाम मौरवी था जो नाग कन्या थीं। बर्बरीक बचपन से ही अत्यंत शक्तिशाली, वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने अपनी माता से युद्ध कला सीखी और भगवान शिव की कठोर तपस्या करके तीन अमोघ बाण प्राप्त किए।
बर्बरीक को प्राप्त तीन बाणों की महिमा अद्वितीय थी। पहला बाण उन सभी को चिह्नित करता था जिन्हें नष्ट करना हो। दूसरा बाण उन सभी को चिह्नित करता था जिन्हें बचाना हो। तीसरा बाण एक ही प्रयोग में समस्त चिह्नित शत्रुओं का नाश कर देता था और पुनः बर्बरीक के तरकश में लौट आता था। इन तीन बाणों के कारण बर्बरीक को तीन बाणधारी भी कहा जाता है।
जब महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था, तब बर्बरीक भी युद्ध में भाग लेने के लिए कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े। उनकी माता ने उनसे वचन लिया था कि वे युद्ध में सदैव उस पक्ष का साथ देंगे जो हार रहा होगा। यह वचन सुनकर भगवान श्रीकृष्ण चिंतित हो गए क्योंकि इस वचन के कारण बर्बरीक बार-बार पक्ष बदलते और युद्ध कभी समाप्त नहीं होता।
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