
कुबेर देव
कुबेर देव की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
कुबेर देव मूल मंत्र
ॐ कुबेराय नमः
दिन
गुरुवार
रंग
पीला
भोग
केसर खीर
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संक्षिप्त तथ्य
पाठ शैली
एक समय में एक अनुभाग
मुख्य भाव
भक्ति, स्पष्टता और आध्यात्मिक अनुशासन
कुबेर देव की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
कुबेर देव की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
भगवान कुबेर जी की कथा
भगवान कुबेर जिन्हें धनाध्यक्ष, धनपति, यक्षराज, वैश्रवण और उत्तर दिशा के दिक्पाल के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में धन, वैभव, समृद्धि, खजाने और भौतिक संपन्नता के अधिष्ठाता देवता माने जाते हैं। वे देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं और समस्त दिव्य संपत्तियों के संरक्षक माने जाते हैं। भक्त उन्हें धन की प्राप्ति, व्यापार में उन्नति, आर्थिक स्थिरता और समृद्ध जीवन के लिए श्रद्धापूर्वक पूजते हैं।
पुराणों के अनुसार भगवान कुबेर महर्षि विश्रवा के पुत्र थे। उनकी माता का नाम इलविला था। इसी कारण उन्हें वैश्रवण भी कहा जाता है। वे रावण, कुंभकर्ण और विभीषण के सौतेले भाई माने जाते हैं, क्योंकि उन तीनों की माता कैकसी थीं।
युवावस्था में कुबेर ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की। उनकी घोर साधना और समर्पण से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें अमूल्य वरदान प्रदान किए। ब्रह्मा ने उन्हें समस्त देवताओं का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया और संसार की समस्त संपत्ति तथा खजानों की रक्षा का दायित्व सौंपा।
भगवान ब्रह्मा ने कुबेर को दिव्य पुष्पक विमान भी प्रदान किया, जिससे वे इच्छानुसार किसी भी स्थान पर जा सकते थे। साथ ही उन्हें स्वर्णमयी लंका का अधिपति बनाया गया। उस समय लंका वैभव, समृद्धि और दिव्य ऐश्वर्य का अद्वितीय केंद्र थी।
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