
ललिता माता
ललिता माता, जिन्हें ललिता त्रिपुरसुंदरी भी कहा जाता है, श्रीविद्या परम्परा में पूजित देवी का करुणामयी और राजराजेश्वरी स्वरूप हैं।
मूल मन्त्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै नमः
दिन
शुक्रवार
रंग
लाल
भोग
केसर खीर
पर्व
नवरात्रि
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
ज्ञान-सौन्दर्य, करुणा, आन्तरिक परिष्कार और देवीकृपा
आवश्यक सीमा
श्रीविद्या मन्त्र और चक्र-पूजन योग्य गुरु के मार्गदर्शन से ही करने चाहिए
ललिता माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
ललिता माता, जिन्हें ललिता त्रिपुरसुंदरी भी कहा जाता है, श्रीविद्या परम्परा में पूजित देवी का करुणामयी और राजराजेश्वरी स्वरूप हैं।
माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी जी की कथा
माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी जिन्हें श्रीविद्या, राजराजेश्वरी, षोडशी, कामेश्वरी और आदिशक्ति के नामों से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में परम सौंदर्य, दिव्य ज्ञान, प्रेम, करुणा और ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। वे दशमहाविद्याओं में तीसरी महाविद्या हैं और सम्पूर्ण सृष्टि की जननी के रूप में पूजित हैं। भक्त उन्हें भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली, समस्त देवताओं की अधीश्वरी तथा परम करुणामयी माँ के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजते हैं।
ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णित ललितोपाख्यान के अनुसार एक समय भण्डासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर उत्पन्न हुआ। कहा जाता है कि वह भगवान शिव द्वारा कामदेव के भस्म होने के बाद उनकी राख से उत्पन्न हुआ था। कठोर तपस्या करके उसने देवताओं से अनेक वरदान प्राप्त किए और धीरे-धीरे तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
भण्डासुर के अत्याचारों से देवता, ऋषि और धर्मात्मा अत्यंत पीड़ित हो गए। उसने यज्ञ, तपस्या और धर्म के कार्यों में बाधा डालनी शुरू कर दी। समस्त देवताओं ने मिलकर आदिशक्ति से प्रार्थना की कि वे धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए अवतार लें।
देवताओं की प्रार्थना से एक दिव्य महायज्ञ का आयोजन किया गया। उस यज्ञ की अग्नि से करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उनका स्वरूप अत्यंत मनोहर, करुणामयी और तेजोमय था। वे लाल कमल पर विराजमान थीं और उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, पुष्पबाण और गन्ने का धनुष सुशोभित था। यही दिव्य शक्ति माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के रूप में प्रकट हुईं।
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