
महाकाली माता
महाकाली माता आदिशक्ति का उग्र किन्तु करुणामयी स्वरूप मानी जाती हैं, जो भय, अहंकार और अधर्म का नाश करती हैं।
मूल मंत्र
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं आद्य कालिका परम् एष्वरी स्वाहा
दिन
शनिवार
रंग
काला
भोग
हलवा
पर्व
काली पूजा
नवरात्रि
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
रक्षा, साहस और आन्तरिक रूपान्तरण
उपासना की धारा
उग्र रूप में भी परम मातृ करुणा
महाकाली माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
महाकाली माता आदिशक्ति का उग्र किन्तु करुणामयी स्वरूप मानी जाती हैं, जो भय, अहंकार और अधर्म का नाश करती हैं।
माँ महाकाली जी की कथा
माँ महाकाली जिन्हें काली, श्यामा, भद्रकाली और आद्याशक्ति के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में शक्ति, संहार, मुक्ति और दिव्य क्रोध की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे माँ दुर्गा का ही उग्र और महाशक्तिशाली स्वरूप हैं। महाकाली को समय, मृत्यु और परिवर्तन की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है — 'काल' का अर्थ है समय और 'काली' अर्थात् जो काल को भी अपने वश में रखती हैं। भक्त उन्हें पाप-नाशिनी, भय-हारिणी, असुर-संहारिणी और मोक्ष प्रदान करने वाली दिव्य माँ के रूप में पूजते हैं।
देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराण में माँ महाकाली के प्रकट होने की कथा इस प्रकार वर्णित है। प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो महाबलशाली असुर भाइयों ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। उन्होंने देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया और समस्त सृष्टि में हाहाकार मचा दिया। देवता भयभीत होकर हिमालय पर गए और माँ आदिशक्ति की स्तुति करने लगे। देवताओं की पुकार सुनकर माँ पार्वती के शरीर से एक दिव्य तेजोमय शक्ति प्रकट हुई जिसे अम्बिका या चण्डिका कहा गया। यही शक्ति आगे चलकर महाकाली के रूप में प्रकट हुईं।
महाकाली के प्रकट होने की सबसे प्रमुख कथा चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज वध से जुड़ी है। जब माँ दुर्गा चण्ड और मुण्ड नामक असुरों से युद्ध कर रही थीं, तब उनके क्रोध से माँ काली प्रकट हुईं। उनका रूप अत्यंत भयावह और उग्र था — काला वर्ण, बिखरे केश, लाल नेत्र, मुख से निकलती जिह्वा और गले में मुण्डमाल। माँ काली ने चण्ड और मुण्ड का वध किया। इसीलिए उन्हें चामुण्डा भी कहा जाता है। माँ का यह उग्र रूप बुराई और अधर्म के विनाश का प्रतीक है।
रक्तबीज वध की कथा माँ महाकाली की सबसे प्रसिद्ध और अद्भुत कथाओं में से एक है। रक्तबीज एक ऐसा असुर था जिसे वरदान था कि उसके रक्त की एक बूँद जब भी धरती पर गिरती, उससे उसी जैसा एक और असुर उत्पन्न हो जाता था। देवी दुर्गा और अन्य देवियाँ उससे युद्ध करती रहीं परंतु हर बार उसके रक्त से हजारों असुर उत्पन्न हो जाते थे। तब माँ महाकाली प्रकट हुईं। उन्होंने अपनी विशाल जिह्वा फैलाकर रक्तबीज के रक्त की एक भी बूँद धरती पर नहीं गिरने दी और उसका संपूर्ण रक्तपान करके उसका वध किया। इस प्रकार माँ महाकाली ने तीनों लोकों की रक्षा की।
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