
नर्मदा माता
नर्मदा माता, जिन्हें भक्त प्रेम से रेवा भी कहते हैं, पवित्र नदी-माता के रूप में पूजित हैं और उनका सम्बन्ध शुद्धि, शिव-भक्ति तथा स्थिर साधना से जुड़ा है।
मूल मन्त्र
ॐ ह्रीं नर्मदायै नमः
दिन
सोमवार
रंग
श्वेत
भोग
नारियल
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
शुद्धि, आन्तरिक स्थिरता, पवित्र जल और शिव-सम्बद्ध भक्ति
पवित्र सम्बन्ध
अमरकंटक, रेवा नाम, नर्मदा परिक्रमा और बाणलिंग
नर्मदा माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
नर्मदा माता, जिन्हें भक्त प्रेम से रेवा भी कहते हैं, पवित्र नदी-माता के रूप में पूजित हैं और उनका सम्बन्ध शुद्धि, शिव-भक्ति तथा स्थिर साधना से जुड़ा है।
माँ नर्मदा जी की कथा
माँ नर्मदा जिन्हें रेवा, शंकरकन्या, नर्मदा मैया और मोक्षदायिनी देवी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सबसे पवित्र नदी-देवियों में से एक मानी जाती हैं। वे भगवान शिव की कृपा से प्रकट हुई दिव्य नदी हैं और उन्हें पापों का नाश करने वाली, मोक्ष प्रदान करने वाली तथा समस्त प्राणियों का कल्याण करने वाली माँ के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है। भारत की सप्त पवित्र नदियों में माँ नर्मदा का विशेष स्थान है।
पुराणों के अनुसार एक समय भगवान शिव अमरकंटक पर्वत पर गहन तपस्या में लीन थे। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि समस्त देवता और ऋषि उनके तेज से अभिभूत हो गए। अनेक वर्षों तक तप करने के पश्चात भगवान शिव के शरीर से दिव्य पसीने की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं। उन दिव्य बूंदों से एक तेजस्विनी कन्या प्रकट हुई, जो आगे चलकर माँ नर्मदा के नाम से विख्यात हुईं।
जब देवताओं ने उस दिव्य कन्या का दर्शन किया, तो वे उसके तेज, सौंदर्य और पवित्रता से अत्यंत प्रभावित हुए। भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि वह कलियुग में करोड़ों जीवों का उद्धार करेगी तथा उसके दर्शन मात्र से मनुष्य को महान पुण्य प्राप्त होगा।
एक अन्य कथा के अनुसार माँ नर्मदा ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने वरदान दिया कि गंगा सहित सभी पवित्र नदियों में उन्हें विशेष स्थान प्राप्त होगा। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि नर्मदा के दर्शन मात्र से वही पुण्य मिलेगा जो अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से प्राप्त होता है।
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