
परशुराम जी
परशुराम जी की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
परशुराम जी मूल मंत्र
ॐ परशुरामाय नमः
दिन
गुरुवार
रंग
केसरिया
भोग
फल
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संक्षिप्त तथ्य
पाठ शैली
एक समय में एक अनुभाग
मुख्य भाव
भक्ति, स्पष्टता और आध्यात्मिक अनुशासन
परशुराम जी की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
परशुराम जी की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
भगवान परशुराम जी की कथा
भगवान परशुराम जी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में पूजित हैं। वे अजर-अमर चिरंजीवी देवता हैं जो आज भी पृथ्वी पर विद्यमान माने जाते हैं। वे ब्राह्मण कुल में जन्मे, किंतु क्षत्रिय धर्म का पालन किया। उन्हें भृगुवंशी, जमदग्नि पुत्र, और परशुधारी राम के नाम से भी जाना जाता है। वे वेद, शास्त्र और शस्त्र — तीनों में पारंगत थे। उनकी महिमा यह है कि उन्होंने अधर्मी और अहंकारी क्षत्रियों का संहार करके धर्म की पुनः स्थापना की और युग-युगांतर तक ब्राह्मण तेज तथा वीरता के अप्रतिम प्रतीक बने रहे।
भगवान परशुराम जी का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र के रूप में हुआ। महर्षि जमदग्नि भृगुवंशी ऋषि थे और माता रेणुका इक्ष्वाकु वंश की राजकन्या थीं। परशुराम जी का मूल नाम राम था, किंतु भगवान शिव से दिव्य परशु — अर्थात फरसा — प्राप्त करने के पश्चात वे परशुराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था जिसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है।
भगवान परशुराम जी ने बाल्यकाल से ही असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और शिवजी से अनेक दिव्यास्त्र तथा विद्याएँ प्राप्त कीं। भगवान शिव ने उन्हें परशु नामक दिव्य अस्त्र प्रदान किया जो उनका मुख्य अस्त्र बना। इसके अतिरिक्त उन्होंने महर्षि विश्वामित्र और अन्य ऋषियों से भी विद्या ग्रहण की। वे धनुर्विद्या में अतुलनीय थे।
परशुराम जी की कथा में सबसे मार्मिक प्रसंग उनकी माता रेणुका से जुड़ा है। एक दिन माता रेणुका नदी से जल लेने गईं जहाँ उन्होंने गंधर्वराज चित्ररथ को देखा और क्षणभर के लिए उनके मन में विकार आया। इससे महर्षि जमदग्नि क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया। चारों बड़े पुत्रों ने माता पर हाथ उठाने से मना कर दिया। केवल परशुराम जी ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता का शीश काट दिया।
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