
पार्वती माता
पार्वती माता करुणामयी आदिशक्ति, शिवपत्नी, तपस्या, गृहस्थ सौहार्द, मातृत्व और मंगल की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।
गौरी मंत्र
ॐ ह्रीं गौर्यै नमः
दिन
सोमवार
रंग
लाल
भोग
नारियल
पर्व
नवरात्रि
महाशिवरात्रि
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संक्षिप्त तथ्य
दिव्य पहचान
उमा, गौरी, भवानी, अंबिका, जगदंबा
पारंपरिक संबंध
सोमवार, लाल अर्पण, गृहशांति, तपस्या
भक्ति का केंद्र
करुणा, सौभाग्य, मातृत्व, आंतरिक शक्ति
पार्वती माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
पार्वती माता करुणामयी आदिशक्ति, शिवपत्नी, तपस्या, गृहस्थ सौहार्द, मातृत्व और मंगल की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।
माता पार्वती जी की कथा
माता पार्वती हिंदू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं। वे शक्ति, प्रेम, समर्पण, मातृत्व और भक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। माता पार्वती भगवान शिव की अर्धांगिनी और भगवान गणेश तथा भगवान कार्तिकेय की माता हैं। उन्हें आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है। वे अलग-अलग रूपों में पूजी जाती हैं, जैसे दुर्गा, काली, गौरी और अन्नपूर्णा। उनका जीवन तपस्या, धैर्य, प्रेम और शक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
प्राचीन समय में माता पार्वती का जन्म हिमालय पर्वत के राजा हिमवान और रानी मैना के घर हुआ था। इसलिए उन्हें “पार्वती” कहा गया, जिसका अर्थ है “पर्वत की पुत्री”। बचपन से ही वे अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और दिव्य गुणों से युक्त थीं। कहा जाता है कि वे माता सती का ही पुनर्जन्म थीं।
माता सती भगवान शिव की पहली पत्नी थीं। लेकिन उनके पिता दक्ष प्रजापति भगवान शिव का अपमान करते थे। एक बार दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और जानबूझकर शिवजी को आमंत्रित नहीं किया। माता सती बिना बुलाए यज्ञ में पहुँचीं, जहाँ उनके पिता ने भगवान शिव का अपमान किया। यह अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
माता सती के वियोग में भगवान शिव अत्यंत दुखी होकर गहन तपस्या में लीन हो गए। संसार का संतुलन बिगड़ने लगा। तब देवताओं ने प्रार्थना की कि माता सती पुनर्जन्म लेकर भगवान शिव से विवाह करें, ताकि संसार में फिर से शक्ति और संतुलन स्थापित हो सके।
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