
शाकम्भरी माता
शाकम्भरी माता देवी का वह पोषणमयी स्वरूप हैं जो अन्न, शाक, फल, औषधि, जल और करुणा से जगत का पालन करती हैं।
मूल मन्त्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शाकम्भर्यै नमः
दिन
शुक्रवार
रंग
हरा
भोग
फल
पर्व
नवरात्रि
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
पोषण, अन्न-समृद्धि, करुणा, आरोग्य और देवी-रक्षा
पवित्र स्वरूप
दुर्गा का पोषणमयी रूप, जिन्हें भक्त शताक्षी नाम से भी स्मरण करते हैं
शाकम्भरी माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
शाकम्भरी माता देवी का वह पोषणमयी स्वरूप हैं जो अन्न, शाक, फल, औषधि, जल और करुणा से जगत का पालन करती हैं।
माँ शाकंभरी देवी की कथा
माँ शाकंभरी देवी आदिशक्ति दुर्गा का एक अत्यंत करुणामयी और लोककल्याणकारी स्वरूप हैं। 'शाकंभरी' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — 'शाक' अर्थात् सब्जियाँ, वनस्पतियाँ और अन्न, तथा 'भरी' अर्थात् धारण करने वाली। इस प्रकार माँ शाकंभरी वह देवी हैं जो संपूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण अन्न, फल, सब्जियों और वनस्पतियों द्वारा करती हैं। वे भूख, अकाल और दुर्भिक्ष का नाश कर जीवों को जीवन प्रदान करती हैं।
प्राचीन काल में दुर्गम नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और वरदान प्राप्त किया कि चारों वेद केवल उसी के अधिकार में रहेंगे। वरदान प्राप्त करते ही उसने वेदों को छिपा लिया। वेदों के लुप्त हो जाने से यज्ञ, हवन, धर्मकर्म और वैदिक अनुष्ठान बंद हो गए।
जब पृथ्वी पर यज्ञ और धर्मकर्म समाप्त हो गए, तब देवताओं को मिलने वाली शक्तियाँ भी क्षीण होने लगीं। वर्षा बंद हो गई, नदियाँ सूखने लगीं, वनस्पतियाँ नष्ट हो गईं और संपूर्ण पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ गया। मनुष्य, पशु-पक्षी और समस्त जीव भूख-प्यास से व्याकुल होकर मृत्यु के कगार पर पहुँच गए।
देवताओं और ऋषियों ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए आदिशक्ति भगवती की आराधना की। सभी ने मिलकर हिमालय की गुफाओं और पवित्र स्थलों में कठोर तपस्या की। उनकी करुण पुकार सुनकर जगज्जननी देवी प्रकट हुईं।
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