
शनि देव
भगवान शनि देव कर्म, न्याय, धैर्य, अनुशासन और सत्यनिष्ठ जीवन के अधिष्ठाता देवता माने जाते हैं।
मूल मंत्र
ॐ शं शनैश्चराय नमः
दिन
शनिवार
रंग
काला
भोग
काले तिल और तेल
पर्व
शनि जयंती
मंगलवार व्रत
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संक्षिप्त तथ्य
दिव्य स्वरूप
कर्मफल दाता और न्याय के देव
पारंपरिक संबंध
भगवान शनिवार, तिल का तेल, काले तिल, विनम्रता
भक्ति का केंद्र
धैर्य, सत्य, सेवा और संयम
शनि देव की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
भगवान शनि देव कर्म, न्याय, धैर्य, अनुशासन और सत्यनिष्ठ जीवन के अधिष्ठाता देवता माने जाते हैं।
शनि देव जी की कथा
भगवान शनि देव हिंदू धर्म में न्याय के देवता और कर्मफलदाता के रूप में पूजे जाते हैं। वे सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं। शनि देव का नाम सुनते ही लोगों के मन में भय और श्रद्धा दोनों उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। लेकिन वास्तव में शनि देव क्रूर नहीं, बल्कि न्यायप्रिय देवता हैं। वे अच्छे कर्म करने वालों को सफलता, सम्मान और समृद्धि देते हैं, जबकि बुरे कर्म करने वालों को उनके कर्मों का दंड देते हैं।
पुराणों के अनुसार, सूर्य देव का विवाह संज्ञा से हुआ था। सूर्य के तेज को सहन न कर पाने के कारण संज्ञा ने अपनी छाया को सूर्य देव की सेवा में छोड़ दिया और स्वयं तपस्या करने चली गईं। छाया से शनि देव का जन्म हुआ। कहा जाता है कि जब शनि देव माता छाया के गर्भ में थे, तब माता ने कठोर तपस्या और भगवान शिव की आराधना की। इसी कारण शनि देव जन्म से ही अत्यंत तेजस्वी और तपस्वी बने।
जब शनि देव का जन्म हुआ, तब उनकी दृष्टि सूर्य देव पर पड़ी और सूर्य का तेज कुछ क्षीण हो गया। इससे सूर्य देव क्रोधित हो गए और उन्होंने शनि देव को स्वीकार नहीं किया। लेकिन बाद में शनि देव की तपस्या, शक्ति और न्यायप्रियता को देखकर सभी देवताओं ने उनका सम्मान किया।
भगवान शनि देव भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं। उन्होंने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया। शिवजी ने उन्हें नवग्रहों में विशेष स्थान दिया और संसार में न्याय करने का अधिकार प्रदान किया। तभी से शनि देव को कर्मों के अनुसार फल देने वाला देवता माना जाता है।
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