शीतला माता

शीतला माता

शीतला माता को शान्ति, शीतलता, रक्षा और स्वास्थ्य-कृपा देने वाली करुणामयी माता के रूप में पूजा जाता है।

सरल शीतला मन्त्र

ॐ शीतलायै नमः

दिन

सोमवार

रंग

श्वेत

भोग

फल

संक्षिप्त तथ्य

मुख्य भाव

शीतल कृपा, रक्षा और पारिवारिक कुशलता

प्रमुख प्रतीक

कलश, मार्जनी, सूप और गर्दभ वाहन

शीतला माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

शीतला माता को शान्ति, शीतलता, रक्षा और स्वास्थ्य-कृपा देने वाली करुणामयी माता के रूप में पूजा जाता है।

माँ शीतला जी की कथा

माँ शीतला जिन्हें शीतला माता, बासौड़ी माता, चेचक माता और महामारी नाशिनी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में स्वास्थ्य, शीतलता, रोगनाश और दिव्य करुणा की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे माँ दुर्गा का ही एक विशेष और कल्याणकारी स्वरूप हैं। माँ शीतला को चेचक, खसरा, ज्वर और अन्य संक्रामक रोगों की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है — वे रोग उत्पन्न भी करती हैं और उन्हें शांत भी करती हैं। भक्त उन्हें ममतामयी माँ, रोगनाशिनी, शीतलता प्रदान करने वाली और बच्चों की रक्षक देवी के रूप में पूजते हैं।
माँ शीतला के प्रकट होने की कथा स्कंद पुराण में विस्तार से वर्णित है। सृष्टि के आरंभ में जब संसार में अनेक प्रकार के रोग और महामारियाँ फैलने लगीं, तब देवता और मनुष्य व्याकुल होकर भगवान ब्रह्मा की शरण में गए। उन्होंने प्रार्थना की कि कोई ऐसी शक्ति प्रकट हो जो इन रोगों से मानव जाति की रक्षा कर सके। ब्रह्मा जी की तपस्या और प्रार्थना से माँ आदिशक्ति की कृपा से एक दिव्य तेजोमय देवी प्रकट हुईं। उनके हाथ में कलश, सूप, झाड़ू और नीम की डाली थी। यही दिव्य देवी माँ शीतला के नाम से जानी गईं।
माँ शीतला के वाहन की कथा अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है। जब माँ शीतला प्रकट हुईं तो उन्हें एक वाहन की आवश्यकता थी। उन्होंने गर्दभ — अर्थात् गधे — को अपना वाहन चुना। देवताओं को आश्चर्य हुआ कि माँ ने इतने सामान्य प्राणी को वाहन क्यों चुना। माँ ने समझाया — 'गर्दभ अत्यंत सहनशील, परिश्रमी और निस्वार्थ प्राणी है। वह बिना शिकायत किए कठिन से कठिन बोझ उठाता है। यही गुण मुझे प्रिय हैं। इसीलिए मैंने इसे अपना वाहन चुना है।' यह कथा हमें सिखाती है कि सेवा और सहनशीलता ही सबसे बड़ा गुण है।
माँ शीतला और ज्वरासुर की कथा अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्वरासुर एक भयंकर असुर था जो ज्वर — अर्थात् बुखार — का देवता था। वह जहाँ भी जाता, वहाँ भयंकर महामारी और ज्वर फैला देता था। लाखों मनुष्य उसके प्रकोप से पीड़ित थे। देवता भी उससे भयभीत थे। तब माँ शीतला ने ज्वरासुर का सामना किया। दोनों में घोर युद्ध हुआ। माँ शीतला ने अपने शीतल जल से ज्वरासुर के ताप को शांत किया और उसे परास्त किया। परंतु माँ ने उसे मारा नहीं — बल्कि उसे अपने साथ रख लिया ताकि वह उनके नियंत्रण में रहे। इसीलिए माँ शीतला के साथ ज्वरासुर भी उनका अनुचर माना जाता है।

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