
सूर्य देव
सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता, प्रकाश, प्राणशक्ति, स्वास्थ्य, साहस, अनुशासन और आध्यात्मिक स्पष्टता के अधिष्ठाता के रूप में पूजा जाता है।
सरल सूर्य मंत्र
ॐ सूर्याय नमः
दिन
रविवार
रंग
केसरिया
भोग
फल
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संक्षिप्त तथ्य
दिव्य स्वरूप
प्रत्यक्ष प्रकाश, प्राण और जीवन-लय के देव
मुख्य साधना
सूर्योदय पर अर्घ्य, रविवार पूजा, पूर्वमुख जप
भक्ति का केंद्र
स्वास्थ्य, तेज, स्पष्ट बुद्धि, आत्मबल, अनुशासन
सूर्य देव की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता, प्रकाश, प्राणशक्ति, स्वास्थ्य, साहस, अनुशासन और आध्यात्मिक स्पष्टता के अधिष्ठाता के रूप में पूजा जाता है।
सूर्य देव जी की कथा
भगवान सूर्य देव हिंदू धर्म में प्रकाश, ऊर्जा, जीवन और शक्ति के देवता माने जाते हैं। वे प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले देवता हैं, इसलिए उन्हें “प्रत्यक्ष देव” भी कहा जाता है। सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। वे संसार को प्रकाश, गर्मी और ऊर्जा प्रदान करते हैं। वेदों और पुराणों में सूर्य देव का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। उन्हें नवग्रहों का राजा भी माना जाता है।
पुराणों के अनुसार, सूर्य देव महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र हैं। उनका तेज इतना प्रबल और दिव्य था कि देवता भी उनके प्रकाश से प्रभावित रहते थे। सूर्य देव सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश में भ्रमण करते हैं। उनके रथ का सारथी अरुण है। सात घोड़े सात रंगों, सात दिनों और सात प्रकार की ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं।
सूर्य देव का विवाह संज्ञा नामक देवी से हुआ था। लेकिन सूर्य देव का तेज इतना अधिक था कि संज्ञा उसे सहन नहीं कर पाती थीं। उन्होंने अपनी छाया को सूर्य देव की सेवा में छोड़ दिया और स्वयं तपस्या करने चली गईं। छाया से शनि देव का जन्म हुआ, जबकि संज्ञा से यमराज और यमुना का जन्म हुआ।
जब सूर्य देव को यह ज्ञात हुआ कि संज्ञा उन्हें छोड़कर चली गई हैं, तब वे अत्यंत दुखी हुए। बाद में उन्होंने अपना तेज कुछ कम किया ताकि संज्ञा उनके साथ रह सकें। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि शक्ति के साथ संतुलन और संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
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