
तुलसी माता
तुलसी माता को पवित्र तुलसी के देवीस्वरूप के रूप में पूजा जाता है, जो विष्णु-भक्ति और गृह-मंगल की आधारशक्ति मानी जाती हैं।
सरल तुलसी मन्त्र
ॐ सुभद्राय नम:
दिन
गुरुवार
रंग
हरा
भोग
पंचामृत
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
शुद्धि, विष्णु-भक्ति और गृह की पवित्रता
जीवित प्रतीक
घर-घर पूजी जाने वाली तुलसी का पावन पौधा
तुलसी माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
तुलसी माता को पवित्र तुलसी के देवीस्वरूप के रूप में पूजा जाता है, जो विष्णु-भक्ति और गृह-मंगल की आधारशक्ति मानी जाती हैं।
माँ तुलसी जी की कथा
माँ तुलसी जिन्हें वृंदा, विष्णुप्रिया, हरिप्रिया और तुलसी माता के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में भक्ति, पवित्रता, सेवा और दिव्य प्रेम की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय हैं और उनके बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। माँ तुलसी को औषधियों की रानी, मोक्षदायिनी और घर की रक्षक देवी कहा जाता है — उनका स्पर्श, दर्शन और सेवा मात्र से पाप नष्ट होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। भक्त उन्हें साक्षात् लक्ष्मी का स्वरूप, विष्णु की परम प्रिया और मोक्ष का सीधा द्वार मानकर पूजते हैं।
माँ तुलसी की उत्पत्ति की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तब उसमें से अनेक दिव्य रत्न और देवियाँ प्रकट हुईं। उसी समय भगवान विष्णु की इच्छाशक्ति से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई जो तुलसी के रूप में अवतरित हुईं। ब्रह्मा जी ने उनका नाम तुलसी रखा जिसका अर्थ है — जो तुलना से परे है। देवताओं ने माँ तुलसी की स्तुति की और भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी परम प्रिया स्वीकार किया। तभी से माँ तुलसी भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय मानी जाती हैं।
माँ तुलसी के जन्म की एक और पवित्र कथा स्कंद पुराण में वर्णित है। धर्मध्वज नामक एक धर्मपरायण राजा थे। उनकी पत्नी माधवी अत्यंत सती और पतिव्रता थीं। उनके यहाँ एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ जो बचपन से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। इस कन्या ने घोर तपस्या करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे विवाह का वरदान माँगा। भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया। यही दिव्य कन्या आगे चलकर तुलसी के नाम से विश्वविख्यात हुईं।
माँ तुलसी और शंखचूड़ असुर की कथा अत्यंत करुणामयी और महत्वपूर्ण है। शंखचूड़ एक महाबलशाली असुर था जिसे भगवान शिव का वरदान प्राप्त था। उसकी पत्नी वृंदा एक परम सती और विष्णु भक्त थी। शंखचूड़ के साथ जब तक वृंदा का सतीत्व अखंड रहा, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता था। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने छल से शंखचूड़ का रूप धारण किया और वृंदा का सतीत्व भंग हो गया। तभी भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध किया। जब वृंदा को सत्य का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया।
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