
वैष्णो देवी
वैष्णो देवी माता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की संयुक्त मातृकृपा के रूप में पूजित हैं, जो भक्तों को बल, समृद्धि और ज्ञान प्रदान करती हैं।
सरल नमस्कार मन्त्र
ॐ श्री वैष्णो देव्यै नमः
दिन
शुक्रवार
रंग
लाल
भोग
हलवा
पर्व
नवरात्रि
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य भाव
रक्षा, साहस और सच्ची भक्ति की सिद्धि
पवित्र सम्बन्ध
त्रिकूट पर्वत, पवित्र गुफा और तीन पिण्डियों का दर्शन
वैष्णो देवी की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
वैष्णो देवी माता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की संयुक्त मातृकृपा के रूप में पूजित हैं, जो भक्तों को बल, समृद्धि और ज्ञान प्रदान करती हैं।
माँ वैष्णो देवी जी की कथा
माँ वैष्णो देवी जिन्हें त्रिकुटा, वैष्णवी, जगजननी और महाशक्ति के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में शक्ति, भक्ति, करुणा और धर्म की रक्षा की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। वे आदिशक्ति के तीन प्रमुख स्वरूप — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — का संयुक्त अवतार हैं। जम्मू-कश्मीर के त्रिकूट पर्वत पर स्थित उनका पवित्र धाम संसार के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। भक्त उन्हें संकटों का नाश करने वाली, मनोकामना पूर्ण करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली माँ के रूप में पूजते हैं।
पुराणों के अनुसार जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार बढ़ने लगा, तब देवताओं ने आदिशक्ति से प्रार्थना की कि वे धर्म की रक्षा के लिए अवतार लें। तब महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के संयुक्त तेज से एक दिव्य कन्या प्रकट हुईं। यह दिव्य शक्ति त्रिकुटा के नाम से प्रसिद्ध हुईं। बाल्यकाल से ही वे भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं और उनका जीवन तप, भक्ति और धर्म की सेवा के लिए समर्पित था।
त्रिकुटा ने समुद्र तट पर वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए। माँ ने भगवान से निवेदन किया कि वे सदैव धर्म की रक्षा और भक्तों के कल्याण का कार्य करना चाहती हैं। भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि कलियुग में वे वैष्णो देवी के नाम से पूजित होंगी और करोड़ों भक्त उनकी शरण में आकर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करेंगे।
रामायण काल में जब भगवान श्रीराम वनवास के दौरान दक्षिण की ओर जा रहे थे, तब माँ वैष्णवी ने उनका दर्शन किया। वे भगवान राम को अपना पति बनाना चाहती थीं। तब श्रीराम ने उन्हें बताया कि वे इस जन्म में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में एकपत्नी व्रत का पालन कर रहे हैं। उन्होंने माँ को आशीर्वाद दिया कि कलियुग में वे जगत की पूज्य देवी बनेंगी और उनके दर्शन मात्र से भक्तों को पुण्य एवं मोक्ष प्राप्त होगा।
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