विन्ध्येश्वरी माता

विन्ध्येश्वरी माता

विन्ध्येश्वरी माता, जिन्हें विंध्यवासिनी भी कहा जाता है, विन्ध्याचल की अधिष्ठात्री देवी और आदिशक्ति के करुणामयी स्वरूप के रूप में पूजित हैं।

सरल विन्ध्यवासिनी मन्त्र

ॐ विन्ध्यवासिन्यै नमः

दिन

शुक्रवार

रंग

लाल

भोग

खीर

पर्व

नवरात्रि

संक्षिप्त तथ्य

मुख्य भाव

शीघ्र कृपा, रक्षा और सच्ची प्रार्थना की सिद्धि

पवित्र सम्बन्ध

विन्ध्याचल धाम, नवरात्रि और त्रिकोण परिक्रमा की परम्परा

विन्ध्येश्वरी माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

विन्ध्येश्वरी माता, जिन्हें विंध्यवासिनी भी कहा जाता है, विन्ध्याचल की अधिष्ठात्री देवी और आदिशक्ति के करुणामयी स्वरूप के रूप में पूजित हैं।

माँ विंध्यवासिनी जी की कथा

माँ विंध्यवासिनी जिन्हें विंध्येश्वरी, विंध्याचलवासिनी, महाशक्ति और आद्याशक्ति के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में शक्ति, सिद्धि, विजय और दिव्य कृपा की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे विंध्याचल पर्वत पर विराजमान हैं और इसीलिए उन्हें विंध्यवासिनी कहा जाता है। माँ विंध्यवासिनी को शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है — वे आदिशक्ति का साक्षात् स्वरूप हैं। भक्त उन्हें सिद्धिदायिनी, मनोकामना पूर्ण करने वाली, भक्तों की रक्षक और असुर-संहारिणी दिव्य माँ के रूप में पूजते हैं।
माँ विंध्यवासिनी की उत्पत्ति की कथा अत्यंत पवित्र और रोमांचकारी है। देवी भागवत पुराण के अनुसार जब कंस ने यह जान लिया कि वसुदेव और देवकी की आठवीं संतान उसका काल होगी, तो उसने देवकी की प्रत्येक संतान को जन्म लेते ही मार डालने का निश्चय किया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो वसुदेव जी उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ छोड़ आए और वहाँ से यशोदा माता की नवजात कन्या को लेकर आए। यह कन्या साक्षात् माँ आदिशक्ति का अंश थीं। जब कंस ने उस कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गईं।
आकाश में प्रकट होकर उस दिव्य कन्या ने अट्टहास किया और कंस से कहा — 'मूर्ख कंस! तेरा काल तो गोकुल में पहुँच चुका है। मुझे मारने से तेरा कोई लाभ नहीं।' यह वचन कहकर वे अंतर्ध्यान हो गईं। यही दिव्य शक्ति विंध्याचल पर्वत पर विराजमान हुईं और माँ विंध्यवासिनी के नाम से जानी गईं। कहा जाता है कि माँ ने स्वयं विंध्याचल को अपना निवास स्थान चुना क्योंकि यह स्थान सृष्टि के आरंभ से ही दिव्य और शक्तिमान रहा है। तभी से विंध्याचल धाम सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक बन गया।
माँ विंध्यवासिनी और महिषासुर की कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। महिषासुर एक महाबलशाली असुर था जिसने ब्रह्मा जी से वरदान पाया था कि उसे कोई पुरुष नहीं मार सकता। इस वरदान के घमंड में उसने तीनों लोकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया गया। समस्त देवता विष्णु और शिव के पास गए। तब सभी देवताओं के तेज से एक महाशक्ति प्रकट हुईं जो माँ विंध्यवासिनी के रूप में विंध्याचल पर अवतरित हुईं। माँ ने नौ दिनों तक महिषासुर से घोर युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। यही कारण है कि नवरात्रि नौ दिनों तक मनाई जाती है।

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