
विश्वकर्मा जी
विश्वकर्मा जी की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
विश्वकर्मा जी मूल मंत्र
ॐ विश्वकर्मणे नमः
दिन
बुधवार
रंग
पीला
भोग
हलवा
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संक्षिप्त तथ्य
पाठ शैली
एक समय में एक अनुभाग
मुख्य भाव
भक्ति, स्पष्टता और आध्यात्मिक अनुशासन
विश्वकर्मा जी की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
विश्वकर्मा जी की उपासना भक्ति, सद्बुद्धि और आंतरिक स्थिरता के लिए की जाती है।
भगवान विश्वकर्मा जी की कथा
भगवान विश्वकर्मा जी हिंदू धर्म में देवताओं के दिव्य शिल्पकार, वास्तुकार, इंजीनियर और सृष्टि के समस्त अद्भुत निर्माणों के रचयिता माने जाते हैं। वे देवलोक के सर्वश्रेष्ठ कारीगर और शिल्पकला के अधिष्ठाता देवता हैं। उनके द्वारा निर्मित दिव्य अस्त्र-शस्त्र, नगर, विमान और भवन अतुलनीय हैं। भक्त उन्हें कला, शिल्प, तकनीक, रचनात्मकता और परिश्रम के देवता के रूप में पूजते हैं। समस्त शिल्पकार, कारीगर, इंजीनियर और तकनीशियन उन्हें अपना आराध्य देव मानते हैं।
वैदिक ग्रंथों में विश्वकर्मा जी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ऋग्वेद में उन्हें विश्व के निर्माता और सर्वदर्शी देवता के रूप में वर्णित किया गया है। वे सर्वज्ञ हैं और उनकी बुद्धि और कौशल अतुलनीय है। उन्हें देवताओं का वास्तुकार, त्वष्टा और प्रभास के पुत्र भी कहा जाता है।
विश्वकर्मा जी की उत्पत्ति की कथा अत्यंत पावन है। वे ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म और वास्तु देवी की संतान माने जाते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार वे अष्टवसुओं में से एक प्रभास और योगसिद्धा के पुत्र हैं। उनके जन्म के साथ ही देवलोक में एक अद्भुत शिल्पकार और निर्माता का आगमन हुआ जिसने समस्त सृष्टि को अपनी कला से सुशोभित किया।
विश्वकर्मा जी की सबसे प्रसिद्ध रचना स्वर्णनगरी लंका है। जब रावण ने भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया, तब शिव जी ने विश्वकर्मा से एक भव्य नगर बनाने को कहा। विश्वकर्मा जी ने सोने से निर्मित एक अत्यंत सुंदर और समृद्ध नगर का निर्माण किया। गृह प्रवेश के समय रावण ने ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया और दान-दक्षिणा में लंका नगरी ही माँग ली। इस प्रकार लंका रावण के अधिकार में आ गई।
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