अन्नपूर्णा माता

अन्नपूर्णा माता

अन्नपूर्णा माता पार्वती जी का वह पोषणमयी स्वरूप हैं जो अन्न, करुणा और आध्यात्मिक विवेक से जीवन को पूर्ण करती हैं।

सरल नमस्कार मन्त्र

ॐ अन्नपूर्णायै नमः

दिन

सोमवार

रंग

पीला

भोग

खीर

संक्षिप्त तथ्य

मुख्य भाव

अन्न, पोषण, कृतज्ञता और गृहस्थ जीवन की सात्त्विक समृद्धि

पवित्र सम्बन्ध

काशी, शिव-पार्वती कथा और अन्न को दिव्य कृपा मानने की परम्परा

अन्नपूर्णा माता की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

अन्नपूर्णा माता पार्वती जी का वह पोषणमयी स्वरूप हैं जो अन्न, करुणा और आध्यात्मिक विवेक से जीवन को पूर्ण करती हैं।

माँ अन्नपूर्णा जी की कथा

माँ अन्नपूर्णा हिंदू धर्म में अन्न, पोषण, समृद्धि, करुणा और दान की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। वे माता पार्वती का दिव्य स्वरूप हैं और समस्त प्राणियों का पालन करने वाली जगज्जननी के रूप में पूजित हैं। 'अन्नपूर्णा' शब्द का अर्थ है — अन्न से पूर्ण करने वाली। भक्त उन्हें भूख का नाश करने वाली, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली और जीवन के पालन-पोषण की दिव्य शक्ति के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजते हैं।
पुराणों के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के बीच संसार की वास्तविकता को लेकर चर्चा हुई। भगवान शिव ने कहा कि यह समस्त भौतिक जगत माया है और अन्न भी उसी माया का एक भाग है। माता पार्वती ने यह सुनकर विचार किया कि यदि अन्न केवल माया है, तो संसार के प्राणियों के जीवन में उसका क्या महत्व है।
माता पार्वती ने संसार को अन्न के वास्तविक महत्व का ज्ञान कराने के लिए अपनी शक्ति समेट ली। जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, पृथ्वी से अन्न, फल, सब्जियाँ और भोजन के सभी स्रोत लुप्त होने लगे। धीरे-धीरे समस्त जीव-जंतु, मनुष्य और देवता भी अन्न के अभाव से पीड़ित होने लगे। पृथ्वी पर भयंकर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई।
जब समस्त संसार भूख से व्याकुल हो उठा, तब देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे इस संकट का समाधान करें। भगवान शिव ने देखा कि वास्तव में अन्न के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। उन्हें यह अनुभव हुआ कि संसार के पालन के लिए अन्न का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और यह केवल माया नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति का स्वरूप है।

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